[प्रार्थना] संत मरियम, समय की कुँवारी
![[Oração] Santa Maria Virgem do tempo](https://locusmariologicus.org/wp-content/uploads/2024/11/Don-Tonino-Belo-e-Maria-gigapixel-low-resolution-v2-4x-faceai.jpeg)
लेखक: Prof. Dr. Daniel C. Afonso · अद्यतन
संत मरियम, प्रभात की कुँवारी
हमें यह आनंद दीजिए कि भोर के इतने कुहासों के बीच भी हम एक नए दिन की आशाओं का पूर्वाभास कर सकें। हमें साहस के शब्दों की प्रेरणा दीजिए।

जब संसार को बूढ़ा बनाने वाली इतनी बुराइयों और पापों के बावजूद हम यह घोषणा करने का साहस करें कि बेहतर दिन आएँगे, तब हमारी आवाज़ को काँपने न दीजिए।
ऐसा न होने दीजिए कि हमारे होंठों पर विलाप विस्मय पर हावी हो जाए, निराशा लगन पर भारी पड़ जाए, संशयवाद उत्साह को कुचल दे और अतीत का बोझ हमें भविष्य पर भरोसा करने से रोक दे।
युवाओं पर अधिक साहस के साथ दाँव लगाने में हमारी सहायता कीजिए और हमें निष्फल शब्दों की चतुराई से उनकी चापलूसी करने के प्रलोभन से बचाइए, यह जानते हुए कि केवल प्रामाणिकता और सुसंगति के हमारे निर्णयों के द्वारा ही वे फिर से मोहित होने के लिए तैयार होंगे।
हमारी शक्तियों को कई गुना बढ़ाइए, ताकि हम उन्हें सभ्यता के बाज़ार में अब भी लाभदायक एकमात्र उद्यम में लगाना जानें: नई पीढ़ियों को उन भयानक बुराइयों से बचाना, जो आज पृथ्वी का दम घोंट रही हैं। हमारी आवाज़ों को पास्का के अल्लेलूया की लय दीजिए।
हमारे यथार्थवाद के मरुस्थलों को सपनों से सराबोर कीजिए। हमें उन उष्ण स्वप्नलोकों का संवर्धक बनाइए, जिनकी दरारों से आशा संसार पर बह निकले।
हमें यह समझने में सहायता कीजिए कि डालियों पर फूटती कोंपलों की ओर संकेत करना गिरते पत्तों पर विलाप करने से अधिक मूल्यवान है।
और हममें उस व्यक्ति का-सा निश्चय भर दीजिए, जो पूर्व दिशा को सूर्य की पहली किरणों से दहकता हुआ पहले ही देख रहा है।
संत मरियम, मध्याह्न की कुँवारी
हमें प्रकाश की मादकता दीजिए। हम अपनी लालटेनों के बुझने, सत्ता की विचारधाराओं के पतन और पृथ्वी के संकरे मार्गों पर सांध्य छायाओं के लंबे होते जाने का अनुभव पहले ही इतना अधिक कर रहे हैं कि मध्याह्न के सूर्य की लालसा किए बिना नहीं रह सकते।
हमें असहायता की वीरानी से बाहर खींच लीजिए और हममें खोज की विनम्रता जगाइए। अपनी अंजलि में हमारी अनुग्रह की प्यास बुझाइए।
हमें उस विश्वास की ओर वापस ले चलिए, जो एक और माँ ने, आपकी ही तरह गरीब और भली, हमें तब सौंपा था जब हम बच्चे थे, और जिसे शायद किसी दिन हमने मसूर की दाल के एक तुच्छ कटोरे के बदले आंशिक रूप से बेचने का प्रयास किया था।
आप, आत्मा की भिखारिन, हमारे कलशों को उस तेल से भर दीजिए जो ईश्वर के सामने जलने के लिए नियत है: हम मरुस्थल की मूर्तियों के सामने पहले ही बहुत अधिक जला चुके हैं।
हमें ईश्वर में अतिमानवीय आत्मसमर्पण के योग्य बनाइए। हमारे दैहिक अहंकार को संयमित कीजिए।
विश्वास का प्रकाश, भले ही वह नबियों जैसी भर्त्सना का स्वर धारण कर ले, हमें अक्खड़ या दंभी न बनाए, बल्कि हमें सहिष्णुता और समझ का आनंद प्रदान करे।
परंतु सबसे बढ़कर, हमें इस त्रासदी से बचाइए कि ईश्वर में हमारा विश्वास हर क्षण के ठोस निर्णयों से, चाहे वे सार्वजनिक हों या निजी, अलग-थलग बना रहे और दैनिक जीवन की वेदी पर कभी मांस और रक्त न बन पाने के जोखिम में पड़ जाए।
संत मरियम, संध्या की कुँवारी
उस घड़ी की माता, जब मनुष्य घर लौटता है, और किसी के द्वारा स्वागत किए जाने के आनंद का स्वाद लेता है, और दूसरों के साथ मेज़ पर बैठने की अवर्णनीय खुशी को जीता है, हमें सहभागिता का वरदान दीजिए।
हम आपसे यह अपनी कलीसिया के लिए माँगते हैं, जो भी विखंडन, संकीर्ण पल्लीवाद और घंटाघर की छाया से अंकित सीमाओं में बंद हो जाने के प्रलोभनों से अछूती नहीं लगती।
हम आपसे यह अपने नगर के लिए माँगते हैं, जिसे विभाजन की भावना कितनी ही बार विवादित भूमि में बदल देती है, और जो कभी-कभी लावारिस भूमि बनता-सा प्रतीत होता है।
हम आपसे यह अपने परिवारों के लिए माँगते हैं, ताकि संवाद, क्रूसित प्रेम और घरेलू स्नेह का शांत अनुभव उन्हें ख्रीस्तीय और नागरिक विकास के विशेष स्थान बना दें।
हम आपसे यह हम सबके लिए माँगते हैं, ताकि स्वार्थ और अलगाव के बहिष्कारों से दूर रहकर हम सदा जीवन के पक्ष में खड़े रह सकें, चाहे वह कहीं भी जन्म ले, बढ़े या मरे।
हम आपसे यह संपूर्ण विश्व के लिए माँगते हैं, ताकि राष्ट्रों के बीच एकजुटता अब अनेक नैतिक दायित्वों में से एक के रूप में न जी जाए, बल्कि उस एकमात्र नैतिक अनिवार्यता के रूप में फिर से खोजी जाए, जिस पर मानवीय सह-अस्तित्व की नींव रखी जाए।
और गरीब लोग समान गरिमा के साथ सबकी मेज़ पर बैठ सकें।
और शांति हमारी दैनिक प्रतिबद्धताओं का लक्ष्य बन जाए।
संत मरियम, रात्रि की कुँवारी
हम विनती करते हैं कि आप हमारे निकट रहें, जब पीड़ा हमें धमकाती है, जब परीक्षा फूट पड़ती है, जब निराशा की हवा सीटी बजाती है और व्यथाओं का काला आकाश, मोहभंगों की ठंड या मृत्यु की कठोर छाया हमारे अस्तित्व पर मँडराती है। हमें अंधकार की कँपकँपी से बचाइए।
हमारी कलवारी की घड़ी में, आप, जिन्होंने सूर्य-ग्रहण का अनुभव किया, हम पर अपना आँचल फैलाइए, ताकि आपकी साँसों से घिरे रहकर स्वतंत्रता की लंबी प्रतीक्षा हमारे लिए अधिक सहनीय हो जाए।
अपने मातृ-दुलार से रोगियों की पीड़ा को कोमल कीजिए। जो अकेले हैं, उनके कड़वे समय को मित्रवत और संकोचशील उपस्थितियों से भर दीजिए।
नाविकों के हृदय में विरह की टीस को शांत कीजिए और उन्हें अपना कंधा दीजिए, ताकि वे वहाँ अपना सिर टिका सकें।
दूर देशों में संघर्ष कर रहे हमारे प्रियजनों को हर बुराई से बचाइए, और अपनी आँखों की मर्मस्पर्शी चमक से उन्हें सांत्वना दीजिए जिन्होंने जीवन पर से भरोसा खो दिया है।
आज भी Magnificat गाइए और पृथ्वी के सभी उत्पीड़ितों के लिए न्याय की उमड़ती लहरों की घोषणा कीजिए। हमें रात में अपने भयों का भजन गाते हुए अकेला न छोड़िए।
इसके विपरीत, यदि अंधकार के क्षणों में आप हमारे पास आ खड़ी हों और हमसे फुसफुसाकर कहें कि आप भी, आगमन की कुँवारी, प्रकाश की प्रतीक्षा कर रही हैं, तो हमारे चेहरे पर आँसुओं के सोते सूख जाएँगे।
और हम मिलकर भोर को जगाएँगे। ऐसा ही हो।
वंदनीय धर्माध्यक्ष अंतोनियो बेल्लो (मृत्यु 1993)
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